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The 3rd Eye News > Blog > धर्म > क्यों मनाई जाती है बकरीद, क्या है कुर्बानी का महत्व? जानें इस त्योहार से जुड़ी मान्यता
धर्म

क्यों मनाई जाती है बकरीद, क्या है कुर्बानी का महत्व? जानें इस त्योहार से जुड़ी मान्यता

Last updated: 2024/06/15 at 6:30 AM
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3 Min Read
क्यों मनाई जाती है बकरीद, क्या है कुर्बानी का महत्व? जानें इस त्योहार से जुड़ी मान्यता
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ईद-उल-अजहा (Eid Ul Adha 2024) या ईद-उल-जुहा यानी बकरीद इस साल 17 जून 2024 को मनाई जाएगी. बकरीद इस्लाम के सबसे पवित्र त्यौहार में एक है. इस्लाम में साल भर में दो ईद मनाई जाती हैं. एक को ‘मीठी ईद’ कहा जाता है और दूसरी को बकरीद. ईद सबसे प्रेम करने का संदेश देती है, तो बकरीद अपना कर्तव्य निभाने का और अल्लाह पर विश्वास रखने का. ईद-उल-जुहा कुर्बानी का दिन भी होता है. बकरीद के दिन इसलिए बकरे या किसी अन्य पशु की कुर्बानी दी जाती है. इसे इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से आखिरी महीने के दसवें दिन मनाया जाता है.

इस्लामिक स्कॉलर मोहम्मद उमेर खान बताते हैं कि धू-अल-हिजाह जो इस्लामिक कैलेंडर का आखिरी महीना होता है. उसके आठवें दिन हज शुरू होकर तेरहवें दिन खत्म होता है. ईद-उल-अजहा यानी बकरीद इसी के बीच में इस इस्लामिक महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है. अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह तारीख हर साल बदलती रहती है. क्योंकि, चांद पर आधारित इस्लामिक कैलेंडर अंग्रेजी कैलेंडर से 11 दिन छोटा होता है.

क्यों मनाई जाती है बकरीद?
इस्लामिक स्कॉलर उमेर खान बताते हैं कि यह हजरत इब्राहिम के अल्लाह के प्रति अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है. यह इस वाकये को दिखाने का तरीका है कि हजरत इब्राहिम अल्लाह में सबसे ज्यादा विश्वास करते थे. अल्लाह पर विश्वास दिखाने के लिए उन्हें अपने बेटे इस्माइल की बलि (कुर्बानी) देनी थी. जैसे ही उन्होंने ऐसा करने के लिए अपनी तलवार उठाई, तभी अल्लाह के हुक्म से उनके बेटे की बजाए एक दुंबा (भेड़ जैसी ही एक प्रजाति) वहां पर आ गई. उनके कुर्बान करने के लिए. आज इसी के आधार पर जानवर की कुर्बानी दी जाती है. इसे तीन भागों में काटा जाता है. एक भाग गरीबों में दान कर दिया जाता है. दूसरा भाग दोस्तों और रिश्तेदारों को दे दिया जाता है. और बचा हुआ तीसरा भाग परिवार खाता है.

कुर्बानी का महत्व
आगे उन्होंने बताया कि इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी. वह थी उनकी खुद की थी. अर्थात ये कि खुद को भूल जाओ, मतलब अपने सुख-आराम को भूलकर खुद को मानवता की सेवा में पूरी तरह लगा दो. तब उन्होंने अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णय लिया. मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ नहीं था. उन्हें मक्का में बसाकर वह खुद मानव सेवा के लिए निकल गए. इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी. ईद उल अजहा के दो संदेश हैं. पहला परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए. खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए. ईद उल अजहा याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार के जरिए एक नया अध्याय लिखा गया.
 

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